गांव रूपडाका में शहीदों की याद में बनाई गई मीनार

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हथीन, (माथुर) | 19 नवम्बर 1857 को जिस भूमि पर अंग्रेजी सेना से लडते हुए सैंकडों मेवाती शहीद हुए उसी भूमि पर मंगलवार 19 नवम्बर को शहीदों की 162 वीं वर्षगांठ हर वर्ष की भांति इस बार भी मनाई जाएगी व मेवाती शहीदों को खिराजे अकीदत पेश की जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1857 की जंग ए आजादी में हथीन सब डिविजन के लोगों ने एकजुट होकर गांव रूपडाका में मोर्चा तैयार किया। इस जंग ए आजादी में रूपडाका के मुकाम पर सैंकडों अमरवीर अंग्रेजों से लडते हुए शहीद हो गए। भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली के रिकार्ड के मुताबिक इनटेलीजेंस डिपार्टमेंट ऑफ गर्वमेंट ऑफ दी नोर्थ वेस्ट प्रोविंस ऑफ इंडिया की तरफ से मेवात के हर गांव में आजादी के संघर्ष को दबाने के लिए फौज की डयूटी लगाई। 19 नवम्बर 1857 को अंग्रेज अफसर डयूमंड 12 हजार की अंग्रेजी फौज को लेकर बल्लभगढ से पलवल होते हुए हथीन के नजदीक रूपडाका पहुंचा, इसकी फौज का दूसरा दस्ता सोहना से हथीन होकर रूपडाका पहुंचा।

इस दिन अंग्रेजों को पता चला कि हजारों मेवाती रूपडाका में एकत्रित होकर विद्रोह करने वाले हैं तथा अंग्रेजी खजाना को पलवल से लूटने वाले हैं। इसीलिए रूपडाका गांव में चढाई की गई। इस दिन पंजाब इनफेेंटरी लेफ्टीनेंट ग्रांट द्वारा रूपडाका में चढाई की गई। इस दिन रूपडाका में सरकारी आंकडों के मुताबिक लगभग साढे 3 हजार लोग एकत्रित हुए थे। जिनमें से लगभग 425 लडाके अंग्रेजी सेना से लडते हुए शहीद हो गए। अंग्रेजी सेना ने न केवल रूपडाका में बल्कि आसपास के गांवों में डयूमंड के नेतृत्व में भारी तबाही मचाई। पचानका, कोट, मीठाका, खिल्लुका, गुराकसर, चिल्ली, रनियाला खुर्द, गोहपुर, उटावड, मालूका, अंधरौला और हथीन शहर के एक इलाके को अंग्रेजी फौज ने आग लगा दी। जिससे भारी नुकसान हुआ। इन्हीं शहीदों की याद में प्रतिवर्ष रूपडाका गांव में शहीदी दिवस समारोह आयोजन किया जाता है। शहीदाने मेवात सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरफुद्धीन मेवाती का कहना है कि मेवात के शहीदों ने देश पर आए हर संकट में आगे कंधा करके अपने बलिदान दिए हैं। गयासुद्धीन बलवन जब हिन्दुस्तान में आया तो मेवाती वीरों ने उसके खिलाफ जबरदस्त संघर्ष किया। मुगलबादशाहों के खिलाफ भी हसन खां

मेवाती एवं दादा बहाड ने जंग लडी। इसके बाद आए अंग्रेजी आक्रमणकारियों के खिलाफ भी मेवातियों ने जमकर संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद इतिहास के पन्नों में मेवात के बलिदानों को उचित स्थान नहीं दिया गया है। मेवाती शहीदों के बारे में उन्होंने कहा कि इतिहास की किताबों में मेवाती शहीदों का कोई जिक्र नहीं है। जबकि अंग्रेजी इतिहासकार टाड ने मेवाती शहीदों के बारे में विस्तृत उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि मेवाती शहीदों की यादों को चिर
स्थाई बनाने के लिए रूपडाका गांव में एक मिनार तथा एक लाईब्रेरी भी बनाई गई है।

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