राजधानी दिल्ली में शहरी नक्सलवाद पर GIA द्वारा आयोजित सेमिनार

सावधान! जंगलों में ही नहीं, शहरों में भी रहते हैं नक्सली

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न्यूज़ एनसीआर, (एकता रमन) 25 अगस्त-नई दिल्ली | देश की राजधानी दिल्ली में शहरी नक्सलवाद (अर्बन नक्सलिज़्म) विषय पर एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया गया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज में ‘अर्बन नक्सलिज़्म, द इनविज़िबल एनेमी’ (शहरी नक्सलवाद, एक अदृश्य शत्रु) नाम से आयोजित इस सेमिनार में देश की कई जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की। इसमें शामिल सभी वक्ताओं ने एक सुर में शहरी नक्सलवाद को देश के लिए बड़ा ख़तरा बताया और इसके खिलाफ देशवासियों को एकजुट होने का आह्वान किया। सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल फिल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक विवेक अग्निहोत्री ने दो टूक कहा कि देश में एक साजिश के तौर पर ऐसा माहौल बनाया गया है जिससे राष्ट्रभक्ति की बात करना भी अपराध के तौर पर देखा जाता है. उन्होंने यह भी कहा की बॉलीवुड भी इसमें पीछे नहीं है, पिछले कई दशकों से बन रही फिल्मों की कहानियाँ, पात्र और उनका प्रस्तुतिकरण में इसे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। इन्हीं साजिशों की वजह से हम अपनी कला, संस्कृति और सभ्यता को भूल रहे हैं और विदेशियों की नकल कर रहे हैं। उन्होंने बॉलीवुड स्टार सैफ अली खान और करीना कपूर पर अपने बेटे का नाम तैमूर रखने पर भी सवाल उठाया। विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा की आज लोग आम आदमी की बात नहीं करते मीडिया भी चुप्पी साधे है लेकिन में इनके साथ खड़ा हूँ मैंने इनके लिए और शहरी नक्सलियों के खिलाफ अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है।

जिया की संयोजिका और सेमीनार की की-नोट स्पीकर मोनिका अरोड़ा ने कहा कि हमारी किताबों में बौद्धिक आतंकवाद की झलक साफ़ दिखाई देती है, जो शहरी नक्सलियों की साजिश है। उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों की किताबों में ग से गधा पढ़ाया जाता है लेकिन ग से गाय नहीं पढ़ाया जाता है। हमारे विश्वविद्यालयों में हमारे धर्म ग्रंथ रामायण का मजाक भी उड़ाया जाता है। विश्वविद्यालयों की किताबों में रावण की छींक से सीता माता के पैदा होने की बात बताई जाती है। यहां तक कि स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे को नशेड़ी कहा जाता है। मोनिका अरोड़ा के शब्दों में शहरी नक्सलियों ने पूरे समाज को मानसिक रूप से भ्रष्ट बनाने की साज़िश रची है। इस मौके पर जवाहरलाल नेहरु विश्वद्यालय (जेएनयू) के उन प्रोफेसरों को भी आड़े हाथों लिया गया जो ये कहते हैं कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा कभी नहीं रही। यह विदेशी अवधारणा है।

इस मौके पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय संगठन सचिव और सेमिनार के मुख्य अतिथि सुनील आंबेकर ने अ.भा.वि.प. के छात्रों और संघ के विचारों से जुड़े लोगों की कुर्बानियां याद कीं। उन्होंने कहा कि इन शहरी नक्सलियों के खिलाफ केवल आंध्र और तेलंगाना में 50 राष्ट्रभक्तों की जानें गयी हैं। आम्बेकर के मुताबिक शहरी नक्सलियों को गरीब जन-जातियों, छोटे-बड़े व्यापारियों से पैसे की उगाही कर पहुँचाया जाता है। उन्होंने इस बात का खुलासा भी किया कि अर्बन नक्सली अलग-अलग जातियों और धर्मों के नाम पर संगठन बनाते हैं और तनाव और हिंसा का माहौल पैदा कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठप्प करने की कोशिश करते हैं। जे.एन.यू. की घटना ने इन शहरी नक्सलियों को बेनकाब कर दिया है और अब राष्ट्रवाद पर भी गंभीर बहस शुरू हो गयी है। सेमिनार में वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत मजूमदार ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इस देश को “थ्री एम” से खतरा है, यानि माओवाद, मिशनरीज़ और मुस्लिम एक्सट्रीमिस्ट। सरकार को चाहिए कि फोरेन फंडिंग वाले एनजीओ पर कड़ी नज़र रखे।

शहरी नक्सलवाद विषय पर आयोजित इस सेमिनार में फिल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक विवेक अग्निहोत्री के अलावा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन सचिव सुनील आंबेकर, सुप्रीम कोर्ट की मशहूर एडवोकेट मोनिका अरोड़ा, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. ए.के. भागी और www.mynation.com के एडिटर-इन-चीफ अभिजीत मजूमदार भी शामिल हुए। इसका आयोजन ‘ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल्स एंड एकेडमिशियंस’ (Group of Intellectuals & Academicians) यानी ‘जिया’ (GIA) ने किया था। इस तरह के गंभीर विषय पर दिल्ली में अपनी तरह का ये पहला आयोजन था। ‘जिया’ ने दिल्ली में आगे भी ऐसे आयोजन करने का फैसला किया है, ताकि शहरों से नक्सलियों की मदद करने वाली ताकतों को बेनक़ाब किया जा सके। देश के दूसरे छोटे-बड़े शहरों में भी ऐसे आयोजन किए जाएंगे। इससे पहले, ‘जिया’ ने जम्मू के कठुआ में बकरवाल समुदाय की एक नाबालिग बच्ची से बलात्कार और हत्या के एक मामले की सच्चाई जानने के लिए बुद्धिजीवियों की एक टीम जम्मू भेजी थी, जिसने तमाम पहलुओं की पड़ताल कर एक तथ्यपरक रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में विदेशी साज़िश, अलगाववादी संगठनों, सियासी दलों और नेताओं की भूमिका और मीडिया के एक ख़ास वर्ग द्वारा एकतरफा कवरेज और ख़बरों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का खुलासा किया गया था।

‘जिया’ का गठन 2015 में किया गया था। ‘द नेशन कम्स फर्स्ट’ (सबसे पहले देश) के मूलमंत्र के साथ काम करने वाले इस संगठन का मकसद देश में एकता, अखंडता और भाईचारे को बढ़ावा देने के साथ-साथ देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को बचाए और बनाए रखने में अपना योगदान देना है। पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित ये संगठन – सेमिनार, डिस्कशन, डिबेट, वर्कशॉप और दूसरी सामाजिक गतिविधियों के ज़रिए देश की तरक्की और खुशहाली में अपना योगदान देता है। इसकी संयोजक सुप्रीम कोर्ट की जानी-मानी वकील मोनिका अरोड़ा हैं। भारत के राष्ट्रपति से बिज़नेस वूमन का सम्मान हासिल कर चुकीं ललिता निझावन इसकी सह-संयोजक हैं। इसके सदस्यों में इग्नू की पूर्व प्रो-वाइस चांसलर प्रोफेसर सुषमा यादव, पर्वतारोही संतोष यादव, चिकित्सा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित डॉ. नंदिनी शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार सर्जना शर्मा, दिल्ली युनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ. पूनम कुमारी, एडवोकेट मनीषा अग्रवाल, महिला उद्यमी मोनिका अग्रवाल, दिल्ली युनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर नमिता गांधी और कला की दुनिया का जाना-माना नाम श्वेता अरोड़ा शामिल हैं।

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