आया था नाम जब तेरा अखबार मे : सिकंदर की कलम से

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लेखक – सिकंदर भारद्वाज | पिछले दिनों देश में दो घटनाएं ऐसी घटी जिन्होंने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा और सोचने के लिए विवश कर दिया। उन्नाव( यु.पी) व कठुआ (कश्मीर) में मासूम लड़कियों से बलात्कार व हत्या। ऐसा नहीं कि यह जघन्य अपराध देश में पहली बार घटा हो और सुर्ख़ियों में आया हो। हर रोज देश में सैंकड़ों बलात्कार होते हैं, कुछ छप जाते हैं, कुछ छुप जाते हैं और बहुत सारे दफना दिया जाते हैं। उन्नाव व कठुआ में जो घटित हुआ उसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। यह वही सभ्य समाज है जहाँ कन्याओं को देवियों का दर्जा प्राप्त है। यह अपराध और भी जघन्य तब बन जाता है जब इसे करने वाला कोई जन-प्रतिनिधि हो, कोई विशेष हो। संसद में बैठकर कानून बनाने वाला प्रतिनिधि दुष्कर्मी कैसे हो सकता है ? कैसे वो किसी कि इज़्ज़त को तार-तार कर सकता है।

कानून के दायरे में जो कठोरतम दंड हो वो तो मिलना ही चाहिए एवं दंड कि प्रकृति कुछ इस प्रकार प्रभावी हो कि उसकी आने वाली पीढ़ियां भी उस दुष्कर्मी से नफरत करें और स्वं को उसकी संतति होने से इंकार कर दें। रेप हुआ ,एफ.आई.आर दर्ज नहीं हुई, ऊपर से आरोपी ने लड़की के पिता कि इतनी बेरहमी से पिटाई की कि कोई सामान्य हृदय का व्यक्ति तो देखकर ही विचलित हो जाए। दुष्कर्मी के साथ-साथ वह प्रशासन व पुलिस महकमा भी उतना ही जिम्मेदार है, जिनकी मौजूदगी में पिता की ऐसी हालत हुई। लेकिन सलाम है उस बहादुर को जिसने उसका वीडियो बनाया और वायरल कर दिया। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए उन सभी को जो आरोपी को बचाते रहे।

ठीक यही स्थिति कठुआ में भी हुई। बेटी चाहे कश्मीर की हो या कन्याकुमारी की या फिर उन्नाव की या आसाम की, बेटी तो बेटी होती है। बेटी की आवरू तो लूटी है, अस्मत से खिलवाड़ तो हुआ है। तुम्हारी बेटी को बचाने कोई नहीं आएगा, पडोसी भी नहीं और सरकारों से तो आस लगाना ही बंद कर दो। एक जाती है, दूसरी आती है, बस चहरे बदलते हैं चरित्र नहीं। ऐसे लोग मानसिक बीमार हैं जो किसी असहाय के देह को रौंधने में ही अपनी जीत समझते हैं। आखिर कौन है ये लोग। रहते कहाँ हैं, नज़र क्यों नहीं आते ये हमें। अगर चहरे से पर्दा हटाया जाए तो ये लोग तुम्हारे आसपास ही मिल जाएंगे, ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है। इनको पहचानना होगा, इनसे आँखों में आँखें डालकर बात करनी होगी, क्योंकि डरना समाधान नहीं है। रोज न जाने कितनी निर्भया, आसिफा इन दरिंदो की शिकार होती हैं। इन लोगों का दरिन्दापन खत्म करने के लिए नि:संदेह कानून का सहारा लेने होगा लेकिन केवल कानून के सहारे बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। देश की बहन-बेटियों को एक होना होगा और हम दरिंदों को रौंदना होगा, खत्म करनी होगी हमारी दरिंदगी हमेशा-हमेशा के लिए। हम संख्या में बहुत ज्यादा नहीं हैं, मात्र हज़ारों में हैं। देवी दुर्गा और काली को हमें खत्म करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

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